क्या हमारे समय की शिक्षा सचमुच मनुष्य को गढ़ रही है या अनजाने ही वह बचपन की सहजता, संवेदनशीलता और स्वप्नों को एक अदृश्य बोझ तले दबा रही है?कंधों पर लदी पुस्तकों के साथ-साथ क्या बच्चे अनकहे भय, अपेक्षाएँ और प्रतिस्पर्धा का दबाव भी ढो रहे हैं? क्या उनकी हँसी अब भी उतनी ही मुक्त है, या वह किसी अनजानी चिंता में धीरे-धीरे सिमटती जा रही है?
और दूसरी ओर— मुक्ति का अर्थ क्या है? क्या मुक्त होना केवल दूर चले जाना है, या स्वयं के भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानकर अपने अस्तित्व को विस्तार देना है? इन प्रश्नों के बीच हमारा समय खड़ा है— संशय, दबाव और आकांक्षाओं के द्वंद्व में उलझा हुआ।
डॉ. नीलोत्पल रमेश की ये कविताएँ सिर्फ भावों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि हमारे समाज, शिक्षा व्यवस्था और मानवीय संबंधों के भीतर
पल रही गहरी चिंताओं का सजीव दस्तावेज हैं। ये कविताएँ हमें झकझोरती हैं, रोकती हैं, सोचने पर विवश करती हैं और शायद पहली बार हमें अपने ही समय के आईने में स्वयं को देखने का साहस देती हैं।
बच्चे स्कूल जा रहे हैं

स्कूल की राह पर चलते ये छोटे कदम सिर्फ किताबें नहीं,समाज की उम्मीदें भी ढो रहे हैं।
बच्चे स्कूल जा रहे हैं
अपनी पीठ पर लादे हुए –
कुरान की आयतें
गीता के श्लोक
बाइबल की सूक्तियां
और – और धर्मों की
अनेक विचारधाराएं
बच्चे स्कूल जा रहे हैं
उनकी पीठ पर बैठा हुआ है पहाड़
पृथ्वी इसके बोझ से असहज महसूस कर रही है
दिशाएं खोती जा रही हैं अपना संतुलन
और चिड़िया चहचहा रही है
बच्चे स्कूल जा रहे हैं
कूदते – फांदते , खिल – खिलाते
जैसे सब कुछ आज ही पा लेंगे अपने स्कूल से
और खुशी – खुशी लौट आएंगे
अपने – अपने घरों को आज शाम तक
बच्चे स्कूल जा रहे हैं
और मांएं आशंकित हैं
पिता सहमे हुए हैं
भाई – बहन भी असहज हैं
कि समय पर , सही-सलामत लौट आएगा न मेरा लाल !
कहीं पद्युम्न की तरह कुछ हो तो नहीं जाएगा न !
बच्चे स्कूल जा रहे हैं
ताकि भविष्य का बीज बन अंकुर ले सकें
जीवन की खुशहाली के लिए
बच्चे स्कूल जा रहे हैं
माता – पिता का अरमान ले
सपनों का पिटारा ले
भूत – वर्तमान – भविष्य ले
ताकि छू लें आसमान |
क्या शिक्षा बोझ बन रही है, या सच में जीवन को रोशन कर रही है? बचपन की मासूमियत और भविष्य की जिम्मेदारी के बीच चलती यह यात्रा ही असली शिक्षा की कहानी है।
तुम्हें मुक्त करता हूँ

छोड़ देना ही कभी-कभी सबसे बड़ा प्रेम होता है। बंधन तोड़कर ही संभावनाएँ जन्म लेती हैं।
तेरी यादें मुझे सताएंगी
संग – साथ जो बना था वर्षों – वर्षों का
आज वह छूट रहा है
तुम सब आओ
तुम्हें मैं मुक्त करता हूँ
अनंत आकाश में विचरने के लिए
अपनी संभावनाओं को तलाशने के लिए
तुम जाओ अपने क्षेत्र की तलाश में
अपने को झोंक दो
ताकि आनेवाला समय तुम्हारा हो
सिर्फ तुम्हारा
अपने अंदर के उत्स को निचोड़ कर
सुनहरे भविष्य को कर लो अपनी मुट्ठी में
तुम जाना लेकिन याद रखना
इस जहां में बहुत मुश्किलें हैं
पग – पग पर बाधाएं तुम्हें भरमायेंगी
जाओ तुम्हें मुक्त करता हूँ
नए जीवन के लिए आगे बढ़ने के लिए
तलाशने के लिए नई जमीन |
मुक्ति सिर्फ दूर जाने में नहीं, खुद को पहचानने में है।
लेखक परिचय

नीलोत्पल रमेश (मूल नाम – रमेश प्रसाद सिंह)
जन्म – 7 फरवरी, 1964, भोजपुर (बिहार)
शिक्षा – एम.ए. (हिंदी), बी.एड., पी-एच.डी.
प्रमुख कृतियाँ: मेरे गाँव का पोखरा, लीक छाड़ि तीनौं चलै, कसौटी के दायरे में, शाल वन की धरा से, बारूद की फसलें आदि।
एक सौ से अधिक कविताएँ, लगभग 150 समीक्षाएँ तथा अनेक कहानियाँ व आलेख प्रकाशित।
सम्मान: जयशंकर प्रसाद स्मृति सम्मान, शब्द शिल्पी सम्मान आदि।
संप्रति: ओ.पी. जिंदल स्कूल, पतरातू (झारखंड) से अवकाश प्राप्त।
संपर्क: गिद्दी, हजारीबाग (झारखंड)
मोबाइल: 09931117537
ईमेल: neelotpalramesh@gmail.com
