प्रख्यात हिंदी कवि डॉ. नीलोत्पल रमेश की दो अत्यंत मार्मिक एवं विचारोत्तेजक कविताएँ
क्या हमारे समय की शिक्षा सचमुच मनुष्य को गढ़ रही है या अनजाने ही वह बचपन की सहजता, संवेदनशीलता और स्वप्नों को एक अदृश्य बोझ तले दबा रही है?कंधों पर लदी पुस्तकों के साथ-साथ क्या बच्चे अनकहे भय, अपेक्षाएँ और प्रतिस्पर्धा का दबाव भी ढो रहे हैं? क्या उनकी हँसी अब भी उतनी ही मुक्त […]
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