“हाशिए पर लिखा गया इतिहास” एक मार्मिक हिंदी कविता है जो समाज के उपेक्षित वर्ग, स्त्री-अनुभव और श्रम की अनकही पीड़ा को स्वर देती है।
1.
हम
जो इतिहास के हाशिए पर लिखे गए थे
स्याही नहीं धूल से रचे गए थे
हमारी देह पर
सभ्यता के हस्ताक्षर नहीं
कोड़ों की लकीरें थीं
उन्होंने कहा
तुम्हारा जन्म ईश्वर की गलती है
हमने देखा
ईश्वर की मूर्ति भी हमारी ही मिट्टी से बनी थी।
2.
गाँव के बीचों-बीच एक कुआँ था
जिसकी जगत पर
बराबरी की कोई छाया नहीं गिरती थी
प्यास जाति पूछकर पानी पीती थी
और औरतें घड़ों में भर लाती थीं
अपनी चुप्पी का खारा स्वाद।
3.
वह औरत
जिसे घर ने चौखट कहा
और समाज ने देह
वह हर रात
अपने सपनों की हड्डियाँ चुनती थी
राख से
उसकी कोख में
सिर्फ बच्चे नहीं,
प्रतिरोध भी पलता था।
4.
हमारे हिस्से की धूप
अक्सर कारखानों की चिमनियों में फँस जाती है
हमारे हिस्से का आसमान
सीमेंट की बोरियों में सिल दिया जाता है
फिर भी
हम अपनी हथेलियों पर
एक छोटा-सा सूरज उगा लेते हैं
जिसकी रोशनी घोषणा-पत्रों से नहीं
घावों से निकलती है।
5.
वे कहते हैं
अब सब बराबर है
संविधान की जिल्द चमकती है
पर पन्नों के बीच
अब भी दबा है
किसी सफाईकर्मी का नाम
जिसके उच्चारण से पहले
लोग पानी पीते हैं।
6.
शहर की सबसे चौड़ी सड़क पर
एक लड़की चल रही है
उसकी चाल में
किसी बंद दरवाज़े का खुलना है
वह कहती है
मुझे मत पढ़ो
देह की तरह
मैं एक पूरा वाक्य हूँ
जिसका अर्थ
बराबरी है
उसके प्रश्न
सिलाई मशीन की तरह चलते हैं
पुरानी कमीज़ का धागा-धागा उधेड़ते हुए
7.
एक दिन
इतिहास की किताब में
कोई बच्चा पढ़ेगा
कुछ लोग थे
जो मिटाए जाते रहे
फिर भी लिखते रहे
अपना नाम
और तब
हाशिए की रेखा
सीधी होकर
मुख्य पाठ बन जाएगा |
यह कविता हाशिए पर लिखे गए इतिहास की उन परतों को खोलती है जिन्हें अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि हाशिए पर लिखा गया इतिहास ही असली समाज की कहानी है।

