(युद्ध की विभीषिका पर आधारित कविता )
सृजन संसार में आज एक ऐसा दृश्य प्रस्तुत है जो सृजन नहीं, विनाश की कहानी कहता है… लेकिन हर विनाश के भीतरएक अधूरा आकाश अब भी जीवित है।
सुबह अभी पूरी तरह उजली भी नहीं हुई थी
कि स्कूल की घंटी ने
एक सामान्य दिन का सपना देखा।
बस्तों में रखी थीं
रंगीन पेंसिलें, अधूरी कविताएँ
और कुछ छोटे-छोटे सपने
जो अक्षरों की तरह
धीरे-धीरे आकार ले रहे थे।
कक्षा की खिड़की से
धूप की एक पतली रेखा
ब्लैकबोर्ड तक आई थी
जैसे कोई आशा
धीरे से पाठ पढ़ाने आई हो।
वह दिन भी वैसा ही होना था
उपस्थितियाँ, प्रश्न, हँसी
और किसी कोने में
चुपचाप बैठी एक लड़की
जो अपने भविष्य का नाम लिख रही थी।
पर अचानक
आकाश ने अपना अर्थ बदल लिया।
एक आवाज़ आई
इतनी तीखी
कि उसने हवा की रीढ़ तोड़ दी।
और फिर
धूप टूट गई।
ब्लैकबोर्ड पर लिखे अक्षर
धूल में बदल गए
और जो शब्द “जीवन” बन रहे थे
वे “विस्मृति” में बदल गए।
कक्षा
जो अभी कुछ क्षण पहले
ज्ञान का घर थी
अब मलबे का एक सवाल बन चुकी थी।
किताबें खुली थीं
पर उनके पन्नों पर
अब कोई पाठ नहीं
सिर्फ राख थी।
एक लड़की की कॉपी में
अधूरा लिखा था
“मेरा सपना…”
और उसके आगे
एक लंबी खामोशी थी।
जैसे किसी ने
भविष्य के वाक्य को
बीच में ही काट दिया हो।
स्कूल के आँगन में
जहाँ कभी दौड़ते थे कदम
अब जूते बिखरे थे
जिन्हें पहनने वाली
कहीं नहीं थीं।
उनकी चोटियों में बंधे रिबन
अब धूल में पड़े थे
जैसे समय ने
उनकी बचपन की पहचान
धीरे से खोल दी हो।
दीवारों पर लगे नक्शे
अब भी टँगे थे,
पर उनमें कोई देश नहीं था
सिर्फ टूटे हुए रंग थे
जो आपस में मिलकर
एक नया प्रश्न बना रहे थे।
यह कैसा युद्ध है
जो सबसे पहले
किताबों पर गिरता है?
जो सबसे पहले
बचपन को मारता है?
जो यह नहीं देखता
कि सामने कोई सैनिक नहीं
एक छात्रा है
जिसकी उँगलियों में अभी
कलम की गर्माहट थी।
धरती उस दिन
थोड़ी और भारी हो गई
क्योंकि उसने
इतनी छोटी-छोटी देहों को
अपने भीतर समेट लिया।
और आकाश
वह बहुत देर तक चुप रहा
जैसे उसे भी शर्म आ गई हो
अपने ही शोर पर।
कहीं एक माँ
अब भी दरवाज़े पर खड़ी है
जैसे अभी भी
स्कूल से लौटने का समय होगा।
वह जानती है
पर मानती नहीं।
उसकी आँखों में
अब भी वही सवाल है
क्या किताबें भी अब सुरक्षित नहीं रहीं ?
कहीं एक शिक्षक
टूटे हुए ब्लैकबोर्ड के सामने
खड़ा है
और पहली बार
उसके पास कोई शब्द नहीं।
क्योंकि जो शब्द
जीवन सिखाते थे
वे मृत्यु के सामने
मौन हो गए हैं।
और कहीं
बहुत दूर
किसी सुरक्षित कमरे में
बैठे हुए लोग
इस घटना को
एक समाचार कह रहे हैं।
पर यह समाचार नहीं
यह इतिहास का सबसे कड़वा वाक्य है
जो बच्चों की लिखावट में
रक्त से दर्ज हुआ है।
फिर भी
किसी टूटी हुई दीवार के पास
एक छोटी-सी कॉपी
अब भी खुली है।
उसमें लिखा है —
“मैं बड़ी होकर…”
युद्ध सिर्फ इमारतों को नहीं गिराता, वह भविष्य, मासूमियत और सपनों को भी मलबे में बदल देता है।
अगर यह कविता आपके भीतर कुछ जगाती है,
तो इसे आगे बढ़ाइए—
क्योंकि संवेदना ही वह शक्ति है
जो संसार को अब भी मानवीय बनाए हुए है।
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“आपके अनुसार क्या युद्ध कभी किसी समस्या का समाधान हो सकता है?”
–कुमार शांडिल्य



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